“सत्ता अस्थायी है, लेकिन समाज स्थायी—नेताओं को समझना होगा ज़िम्मा”
“भाषणों की तल्ख़ी से टूट रहा है सद्भाव और भाईचारा”
“मीडिया और नागरिकों को निभानी होगी अपनी भूमिका”

लोकतंत्र की ताक़त उसके संवाद, विचार-विमर्श और सहिष्णुता में छिपी होती है। विचारों का टकराव स्वाभाविक है, लेकिन जब यह टकराव व्यक्तिगत आक्षेपों, नफ़रत फैलाने वाले बयानों और समाज को बाँटने वाली भाषा में बदल जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। आज भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक नेताओं की भाषा और भाषणों पर प्रश्नचिह्न उठ रहे हैं। चुनावी राजनीति की होड़ और सत्ता प्राप्ति की महत्वाकांक्षा ने इस भाषा को और अधिक विषाक्त बना दिया है। किसी भी नेता के मुख से निकला एक शब्द समाज की दिशा बदलने की ताक़त रखता है। यही कारण है कि राजनीतिक असहिष्णुता केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सामाजिक जीवन, संस्थागत ढाँचे और नागरिकों के रिश्तों पर भी गहरी चोट पहुँचाती है।
भारत के राजनीतिक दलों में ऐसे नेता बहुत कम हैं जो वास्तव में देशहित को सर्वोपरि मानते हुए निःस्वार्थ भाव से कार्य करें और जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारत माता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया हो। सत्ता तो अस्थायी होती है, लेकिन समाज और उसकी समस्याएँ स्थायी रहती हैं, इसलिए नेताओं को यह समझना होगा कि असली ज़िम्मेदारी केवल कुर्सी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को सही दिशा देना और आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत नींव तैयार करना ही उनका सर्वोच्च कर्तव्य है।
राजनीति और भाषा की गिरावट
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ विचारों की विविधता, जातीय-सांस्कृतिक बहुलता और धार्मिक सह-अस्तित्व की परंपरा रही है। किंतु पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक भाषा का स्तर गिरा है। संसद से लेकर सड़कों तक, चुनावी मंचों से लेकर टीवी बहसों तक, नेताओं के बयान शालीन संवाद से अधिक कटाक्ष, तंज़ और अपमानजनक शब्दों से भरे हुए सुनाई देते हैं।
राजनीतिक दलों का ध्यान आज विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण जैसे मुद्दों से हटकर जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय विभाजन पर जाकर टिकता है। सत्ता की लालसा में वे ऐसे भाषण देते हैं जिनसे समाज में ध्रुवीकरण हो। यह असल में जनता की भावनाओं को भड़काने का साधन बन गया है। यही भाषा समाज में असहिष्णुता को जन्म देती है।
असहिष्णुता: लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु
लोकतंत्र की आत्मा सहमति और असहमति दोनों को स्वीकार करने की क्षमता है। यदि असहमति को सहन करने का गुण समाप्त हो जाए तो लोकतंत्र का ढाँचा कमजोर पड़ जाता है।
आज देखा जा रहा है कि यदि कोई व्यक्ति सरकार या किसी नेता की आलोचना करता है, तो उसे तुरंत “देशद्रोही”, “विरोधी”, या “गद्दार” कहकर निशाना बनाया जाता है। यह मानसिकता असहिष्णुता को बढ़ावा देती है। राजनीतिक भाषणों में जब विपक्ष को दुश्मन और जनता को अलग-अलग खेमों में बाँटा जाता है, तब नागरिक समाज में आपसी अविश्वास बढ़ता है।
असहिष्णुता का सबसे बड़ा असर युवाओं पर होता है। युवा वर्ग राजनीति से प्रेरणा लेने की बजाय नफ़रत और कटुता से प्रभावित होता है। इससे सामाजिक ताने-बाने पर सीधा आघात पहुँचता है।
मीडिया की भूमिका
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। उसकी जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों को निष्पक्ष ढंग से सामने रखे और जनता के बीच संवाद को सकारात्मक दिशा दे। किंतु वर्तमान परिदृश्य में मीडिया भी राजनीतिक भाषणों और असहिष्णुता का शिकार बन चुका है।
टीवी चैनलों पर होने वाली बहसें अक्सर संवाद से अधिक शोरगुल और आरोप-प्रत्यारोप का मंच बन जाती हैं। कई बार मीडिया खुद ही राजनीतिक बयानों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है ताकि अधिक दर्शक जुट सकें। इससे समाज में तनाव और बढ़ता है।
मीडिया यदि अपनी जिम्मेदारी निभाए तो न केवल राजनीतिक भाषा संयमित होगी, बल्कि जनता में भी सहिष्णुता की भावना बढ़ेगी। लेकिन जब मीडिया सत्ता या किसी विशेष दल का प्रचारक बन जाता है, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ता है।
नागरिकों की जवाबदेही
लोकतंत्र केवल नेताओं और दलों का खेल नहीं है, बल्कि इसमें जनता की भूमिका सबसे अहम है। आम नागरिकों को यह समझना चाहिए कि राजनीतिक भाषणों में नफ़रत फैलाने वाले शब्दों को बढ़ावा देना असल में उनके ही भविष्य को अंधकारमय बनाता है।
सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, भड़काऊ पोस्ट और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ केवल तभी वायरल होती हैं जब जनता उन्हें शेयर करती है। इसलिए नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे सोच-समझकर प्रतिक्रिया दें और नेताओं से जवाबदेही माँगें।
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जब जनता असहिष्णुता को स्वीकार करना बंद कर देगी और शालीन भाषा व व्यवहार की माँग करेगी, तभी राजनीतिक दल भी संयमित होंगे।
इतिहास से सबक
भारत का स्वतंत्रता संग्राम इसका सटीक उदाहरण है। उस समय महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष चंद्र बोस और अन्य नेताओं ने तीखी असहमति होने के बावजूद भाषा और आचरण में एक मर्यादा बनाए रखी। गांधी जी का ‘अहिंसा’ और ‘सत्य’ पर आधारित संवाद भारतीय राजनीति की पहचान था।
आज नेताओं को यह स्मरण रखना चाहिए कि स्वतंत्रता सेनानियों ने सत्ता के लिए नहीं, बल्कि देश की अखंडता और भाईचारे के लिए संघर्ष किया था। अगर वे भी आपस में असहिष्णु होते, तो भारत की स्वतंत्रता संभव नहीं हो पाती।
सत्ता की लालसा और निजी स्वार्थ
चुनावी राजनीति का चक्र ऐसा है कि हर पाँच साल में नेता जनता के बीच आते हैं। इस समय सत्ता पाने की लालसा नेताओं को ऐसे भाषण देने को प्रेरित करती है जिनसे मतदाता भावनात्मक रूप से प्रभावित हो जाए। निजी स्वार्थ और पार्टीगत लाभ देश की एकता और भाईचारे पर भारी पड़ रहे हैं।
यह प्रवृत्ति खतरनाक है क्योंकि सत्ता अस्थायी है लेकिन देश और समाज स्थायी हैं। नेताओं को यह समझना होगा कि उनकी एक अपमानजनक टिप्पणी समाज को वर्षों तक बाँट सकती है।
समाधान की दिशा
राजनीतिक भाषणों में संयम और शालीनता लाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास ज़रूरी हैं:
- राजनीतिक दलों का आत्मनियंत्रण: दलों को अपने नेताओं की भाषा पर नियंत्रण रखना होगा और आचार संहिता का पालन करना होगा।
- चुनाव आयोग की सख़्ती: यदि कोई नेता भड़काऊ भाषण देता है तो तुरंत उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।
- मीडिया की निष्पक्षता: मीडिया को सनसनी फैलाने की बजाय तथ्यपरक रिपोर्टिंग करनी होगी।
- जनता की सजगता: नागरिकों को नफ़रत की भाषा को अस्वीकार करना होगा और केवल मुद्दों पर आधारित राजनीति को समर्थन देना होगा।
- शिक्षा और जागरूकता: स्कूल-कॉलेज स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों और सहिष्णुता की शिक्षा देना आवश्यक है।
राजनीतिक भाषणों की असहिष्णुता केवल एक दल या नेता की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र के लिए चुनौती है। लोकतंत्र तभी मज़बूत होगा जब संवाद, आलोचना और असहमति को सम्मान मिलेगा।
आज आवश्यकता है कि हम यह स्मरण रखें कि लोकतंत्र जनता की आकांक्षाओं का आईना है। सत्ता के चक्र में यदि दल भाईचारा, एकता और अखंडता को भूल जाते हैं, तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। नेताओं को चाहिए कि वे अपने शब्दों की ताक़त को समझें और उन्हें देश को जोड़ने के लिए इस्तेमाल करें, तो वहीं जनता को भी चाहिए कि वह विवेक और सजगता से राजनीति का मूल्यांकन करे।यदि हम सब मिलकर असहिष्णुता के विरुद्ध खड़े हों और सकारात्मक संवाद को बढ़ावा दें, तभी लोकतंत्र की जड़ें गहरी होंगी और भारत विश्व में एक आदर्श राष्ट्र के रूप में खड़ा रहेगा।

