
दिल्ली,21 अगस्त 2025, संपादन राम प्रकाश वत्स
रैपिडो पर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) द्वारा लगाया गया 10 लाख रुपये का जुर्माना केवल एक कंपनी के खिलाफ की गई कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह उन सभी व्यावसायिक संस्थाओं के लिए चेतावनी है जो उपभोक्ताओं के विश्वास के साथ खिलवाड़ करती हैं। “5 मिनट में ऑटो या ₹50” जैसा दावा सुनने में आकर्षक जरूर लगता है, परंतु इसके पीछे छिपी शर्तों ने उपभोक्ताओं को गुमराह किया। उपभोक्ता, जो विज्ञापनों को देखकर भरोसा करते हैं, अंततः खुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहाँ वादा कागज़ों पर कुछ और और वास्तविकता कुछ और होती है। यह घटना केवल रैपिडो तक सीमित नहीं है, बल्कि उपभोक्ता संस्कृति में व्याप्त उस प्रवृत्ति को उजागर करती है जिसमें कंपनियाँ बड़े दावे करती हैं और छोटे अक्षरों में छिपे नियम उपभोक्ता की उम्मीदों को तोड़ देते हैं।
वास्तविकता यह है कि डिजिटल युग में भ्रामक विज्ञापन सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं। “गारंटीड”, “फ्री” और “तुरंत लाभ” जैसे शब्द उपभोक्ता को लुभाने में तो कामयाब हो जाते हैं, परन्तु जब उपभोक्ता अनुभव इन दावों से मेल नहीं खाता तो असंतोष और अविश्वास फैलता है। सीसीपीए की जाँच ने साफ कर दिया कि रैपिडो का ₹50 नकद नहीं बल्कि “रैपिडो सिक्कों” में था, जिनकी सीमित वैधता और उपयोगिता ने उपभोक्ता को मजबूर किया कि वह दोबारा सेवा ले। यह उपभोक्ता अधिकारों के साथ अन्याय ही नहीं, बल्कि बाज़ार की पारदर्शिता पर भी चोट है। सवाल यह है कि यदि विज्ञापन ही उपभोक्ता को भ्रमित करने लगें तो फिर भरोसे की डोर कहाँ बचेगी?
आज आवश्यकता है कि इस घटना को अवसर की तरह लिया जाए और उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा को और मज़बूती दी जाए। सीसीपीए की यह कार्रवाई स्वागतयोग्य है, पर इसे अंतिम कदम नहीं माना जा सकता। कंपनियों को यह समझना होगा कि उपभोक्ता केवल ग्राहक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। यदि उन्हें भ्रमित किया जाएगा, तो यह विश्वासघात होगा। वहीं उपभोक्ताओं को भी सतर्क रहने की ज़रूरत है, ताकि वे केवल चमकते वादों से प्रभावित न हों और हर ऑफर की सच्चाई को परख सकें। यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि उपभोक्ता और बाज़ार का रिश्ता विश्वास पर टिका है, और जब यह विश्वास टूटता है तो उसका असर केवल एक कंपनी पर नहीं, पूरे व्यापारिक वातावरण पर पड़ता है।

