हिमाचल में स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण — समस्त सुविधाओं से युक्त अस्पतालों की भारी कमी चिंताजनक
( न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स)
हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की वर्तमान स्थिति प्रदेशवासियों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। भौगोलिक रूप से जटिल और दुर्गम क्षेत्रों वाला यह पर्वतीय राज्य आज भी समस्त सुविधाओं से युक्त, आधुनिक अस्पतालों की भारी कमी से जूझ रहा है। प्राथमिक चिकित्सा से लेकर आपातकालीन सेवाओं तक, हर स्तर पर संसाधनों की कमी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर को उजागर करती है।
प्रदेश के अधिकांश जिला अस्पतालों में आईसीयू, एमआरआई, सीटी स्कैन, डायलिसिस, कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी जैसी सुविधाएं या तो सीमित हैं या पूरी तरह अनुपलब्ध। गंभीर रोगियों को आज भी शिमला, चंडीगढ़ या दिल्ली रेफर करना आम बात है। इससे न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
कुछेक बड़े अस्पतालों को छोड़ दें, तो शेष राज्य में आज भी ऐसे असंख्य चिकित्सा केंद्र हैं जहां चिकित्सक की नियमित उपस्थिति नहीं होती। कई अस्पतालों में दशकों पुराने उपकरण अब तक उपयोग में हैं। कुछ स्थानों पर अंग्रेजों के जमाने के एक्स-रे मशीन अब भी “सेवा में” हैं, जो प्रदेश की चिकित्सा दशा पर कटाक्ष की तरह प्रतीत होते हैं।
राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर मेडिकल कॉलेज खोलने, टेलीमेडिसिन और आयुष्मान योजना लागू करने जैसे प्रयास किए गए हैं, परंतु उनका लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुंच पाया है। वास्तविक जरूरत आधुनिक तकनीक से लैस ऐसे अस्पतालों की है जो हर जिले में रोगियों को समुचित इलाज दे सकें, ताकि आम नागरिक को इलाज के लिए शहरी महानगरों की ओर न भागना पड़े।
स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए सरकार को समेकित नीति अपनानी होगी। जिला और ब्लॉक स्तर पर बहु-विशेषज्ञता वाले अस्पताल स्थापित किए जाने चाहिए, मेडिकल उपकरणों का आधुनिकीकरण किया जाए, और डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ की स्थायी नियुक्ति को प्राथमिकता दी जाए।
सारगर्भित है
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का मज़बूत आधार केवल “योजनाओं की घोषणा” से नहीं, बल्कि “जमीनी क्रियान्वयन” से बनेगा। यह आवश्यक है कि स्वास्थ्य को सरकार के विकास एजेंडे में सबसे ऊपर रखा जाए। एक मजबूत और समर्पित स्वास्थ्य प्रणाली ही एक स्वस्थ और खुशहाल हिमाचल की नींव रख सकती है।

