भारत माता जकड़ी हुई थी… बेड़ियों में, अपमान में, और पीड़ा में। चारों ओर अंग्रेजी हुकूमत का अत्याचार था। इसी अंधेरे में एक दीप जन्म लेता है—रास बिहारी बोस।
रास बिहारी बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ की नींव रखी। यह सिर्फ एक सेना नहीं थी, यह भारत की आशा थी, उसका स्वाभिमान थी।फिर एक ऐतिहासिक क्षण आया—जब उन्होंने इस फौज की कमान सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी। यह त्याग नहीं, यह राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण था।तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”—यह नारा अब हर भारतीय के दिल में गूंजने लगा।
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
भारत माता की स्वतंत्रता कोई एक दिन की घटना नहीं थी, यह अनगिनत बलिदानों, यातनाओं और तपस्याओं की लंबी गाथा है। यह उस पीड़ा की कहानी है, जिसमें हर क्रांतिकारी ने अपने प्राणों को हंसते-हंसते न्योछावर कर दिया। इन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम है—रास बिहारी बोस—जिनकी क्रांति की ज्वाला ने विदेशी सत्ता की नींव तक हिला दी।
जब भारत माता पर गुलामी की बेड़ियाँ कसी जा रही थीं, तब देश के सपूतों ने हथियार उठाने का संकल्प लिया। रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल की पावन धरती पर हुआ। बचपन से ही उनके मन में स्वतंत्रता की लौ प्रज्वलित थी। स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी विचारों और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की ‘आनंद मठ’ जैसी कृतियों ने उनके हृदय में राष्ट्रभक्ति का ज्वार भर दिया। वे समझ चुके थे कि भारत माता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संघर्ष और बलिदान से ही रास्ता निकलेगा।वह समय अत्याचारों का था, जब अंग्रेजी शासन भारतीयों को अपमानित कर रहा था। 1912 में दिल्ली में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की ऐतिहासिक योजना रची गई। इस योजना के सूत्रधार रास बिहारी बोस थे। यह केवल एक हमला नहीं था, बल्कि यह गुलामी के विरुद्ध एक उद्घोष था—एक संदेश कि भारत अब जाग चुका है। इस घटना के बाद उन्हें भूमिगत होना पड़ा, परंतु उनका साहस कभी डगमगाया नहीं।गदर की गूंज ने पूरे देश को झकझोर दिया। जतिन मुखर्जी जैसे महान क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने ब्रिटिश सेना में विद्रोह की योजना बनाई। यह वह दौर था जब हर क्रांतिकारी जानता था कि उसका अंत निश्चित है, फिर भी वह मातृभूमि के लिए आगे बढ़ता रहा।अंग्रेजों की पकड़ से बचते हुए 1915 में वे जापान पहुंचे। परंतु देश से दूर रहकर भी उनका हृदय भारत के लिए ही धड़कता रहा। जापान की धरती से उन्होंने ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया। यह उनका दूरदर्शी नेतृत्व था, जिसने आजादी की लड़ाई को सीमाओं के पार पहुंचा दिया।1942 में उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ की नींव रखी—एक ऐसी सेना, जिसका उद्देश्य केवल एक था—भारत माता को स्वतंत्र कराना। बाद में 1943 में उन्होंने इसकी कमान सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी। यह त्याग और समर्पण का अद्भुत उदाहरण था, जहाँ व्यक्ति नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि था।रास बिहारी बोस का जीवन यह सिखाता है कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती। इसके लिए पीढ़ियों को तपना पड़ता है, अपने सुख-दुख त्यागने पड़ते हैं, और कभी-कभी अपनी पहचान तक मिटानी पड़ती है। उन्होंने विदेश की धरती पर रहकर भी भारत की आजादी का दीप जलाए रखा।21 जनवरी 1945 को टोक्यो में उनका शरीर भले ही शांत हो गया, लेकिन उनकी क्रांति की ज्वाला आज भी हर भारतीय के हृदय में प्रज्वलित है। वे एक “मौन क्रांतिकारी” थे—जिनका शोर कम था, पर प्रभाव असीम।भारत माता की स्वतंत्रता उन वीरों के कारण संभव हुई, जिन्होंने अपनी हर सांस को राष्ट्र को समर्पित कर दिया। रास बिहारी बोस का जीवन इसी अमर सत्य का प्रतीक है कि गुलामी की जंजीरें तभी टूटती हैं, जब कोई उन्हें तोड़ने का साहस करता है।

