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श्रद्धा और समर्पण भाव से करनी चाहिए भगवान शिव की आराधना

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— स्वामी आदेश पुरी जी महाराज, सिद्धपीठ पनियाला धाम

धार्मिक दृष्टिकोण से शिव भक्ति केवल एक पूजा नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन है। भगवान शिव, जिन्हें आशुतोष कहा गया है — अर्थात जो थोड़े से भी श्रद्धा भाव से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं — समस्त चराचर जगत में व्याप्त हैं। तीनों लोकों के स्वामी शिव, हर ऋतु, प्रत्येक मास और समस्त जीवों के प्रति करुणा और प्रेमभाव रखते हैं।

फिर भी सोमवार, श्रावण मास, गंगाजल, बिल्व पत्र और भस्म आदि उन्हें विशेष प्रिय हैं। इसका कारण उनका स्वरूप और साधना की शैली है। मस्तक पर द्वितीय (अर्ध) चंद्र का विराजमान होना, कैलाश जैसे शांत और हिममय स्थल पर निवास, दिगंबर वेश तथा सर्प और भूतगणों के साथ विचरण — यह सब एक संदेश है कि शिव मर्यादा से परे होते हुए भी सनातन मर्यादा के प्रतीक हैं।

भगवान शिव की जीवनशैली प्रत्येक मानव के लिए प्रेरणा का अमूल्य स्रोत है। यदि हम शिव परिवार का चिंतन करें तो पाएंगे कि उनके परिवारीजन प्रतीकों के रूप में विरोधाभास लिए हुए हैं — शिव का वाहन नंदी बैल है, तो माँ पार्वती का सिंह; गणेश का मूषक है तो कार्तिकेय का मयूर। बावजूद इसके, परिवार में कहीं कोई द्वेष या संघर्ष नहीं, केवल प्रेम, संतुलन और समर्पण है। यह शिव का अद्वितीय दर्शन है — विरोधों में भी समरसता।

महंत आदेश पुरी जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के अविभाज्य अंग हैं। शक्ति के बिना शिव शव हैं और शिव के बिना शक्ति दिशाहीन है। जैसे सूर्य और उसकी किरणें, जैसे अग्नि और उसका ताप — वैसे ही शिव और शक्ति का संबंध शाश्वत और अभिन्न है। यही प्रकृति और पुरुष का सनातन सिद्धांत है।

उन्होंने आगे कहा कि सच्चा शिवभक्त वही है जो श्रद्धा, समर्पण और आत्मनिवेदन भाव से आराधना करता है। शिव को किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि वे संपूर्ण सृष्टि के आदिपति हैं। वे किसी एक जाति, धर्म या राष्ट्र के नहीं — बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड के आराध्य हैं।

शिव तत्त्व को समझना केवल तर्क से नहीं, अनुभव और आत्मज्ञान से संभव है। जैसे आकाश सभी दिशाओं में व्याप्त है, जैसे जल धरती की तहों में समाया है, वैसे ही शिव का तत्त्व भी प्रत्येक जीव के भीतर अदृश्य लेकिन अनुभव्य रूप में स्थित है।

अतः शिव भक्ति का अधिकार सभी को है — चाहे स्त्री हो या पुरुष, ज्ञानी हो या साधारण — जो भी सच्चे मन, निष्ठा और प्रेम से उनका स्मरण करता है, वही शिव की कृपा का पात्र बनता है।

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