Reading: श्री हरिकथा से मिलता है जीवन को नई दिशा और ज्ञान का प्रकाश

श्री हरिकथा से मिलता है जीवन को नई दिशा और ज्ञान का प्रकाश

RamParkash Vats
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साध्वी सरोज भारती जी नूरपुर से विनय महाजन नूरपुर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से शिव मंदिर बासा बजीरा( नूरपुर ) में तीन दिवसीय श्री हरिकथा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रभु चरणों में मंगल वंदना के सुमधुर गायन से हुआ। इस अवसर पर क्षेत्र के श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर प्रभु की महिमा का श्रवण किया और आध्यात्मिक विचारों से लाभ प्राप्त किया।कथा के प्रथम दिवस में दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सरोज भारती जी ने श्री हरिकथा की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि कथा रूपी अमृत जिस जीव के जीवन में प्रवेश करता है, उसके जीवन को एक नई दिशा प्राप्त होती है।

कथा मनुष्य के अंतर्मन में व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करती है। यह केवल श्रवण का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझने और अपने वास्तविक लक्ष्य की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भी है।साध्वी जी ने कहा कि संत-महापुरुषों ने कथा की तुलना मां गंगा से की है। जिस प्रकार गंगा में स्नान करने की धार्मिक मान्यता व्यक्ति को पवित्रता का संदेश देती है, उसी प्रकार कथा रूपी गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य को आत्मिक शुद्धता और जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य कथा के आध्यात्मिक संदेश को अपने जीवन में धारण करे।सत्संग की महिमा पर प्रकाश डालते हुए साध्वी जी ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में संतों और महापुरुषों ने सत्संग को विशेष महत्व दिया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में अनेक चौपाइयों और दोहों के माध्यम से सत्संग की महानता का वर्णन किया है। सत्संग दो शब्दों से मिलकर बना है—‘सत्’ और ‘संग’। अर्थात सत्य का संग करना। जब मनुष्य सत्य के साथ जुड़ता है, तब उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है और वह परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ता है।कार्यक्रम के दौरान साध्वी कुलदेवी भारती, महात्मा अश्विनी जी एवं महात्मा मनप्रीत जी ने सुमधुर भजनों का गायन कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण के साथ भजनों का आनंद लिया। कार्यक्रम में क्षेत्र के गणमान्य व्यक्ति एवं अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। अंत में प्रभु की पावन आरती के साथ प्रथम दिवस की कथा को विराम दिया गया।

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