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गिरिपार में आस्था की ज्योति से जगमगाया जनजीवन, मशालें जलाकर मनाया जा रहा आठों पर्व

RamParkash Vats
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माता भवानी की आराधना, दराड़ी के पवित्र फूलों का पूजन और हुशू मशालों की परंपरा से जीवंत हुई सदियों पुरानी लोक संस्कृति

सिरमौर:हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जनपद का गिरिपार क्षेत्र अपनी समृद्ध धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन लोक परंपराओं और विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां की मिट्टी में रची-बसी देव संस्कृति आज भी लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इसी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक आठों पर्व इन दिनों पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कहीं घरों में माता भवानी की आराधना हो रही है, तो कहीं हुशू कहलाने वाली पारंपरिक मशालें जलाकर पर्व की प्राचीन परंपरा को जीवंत किया जा रहा है।

गिरिपार में मनाया जाने वाला आठों पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि देवी उपासना, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और पूर्वजों से मिली सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का पवित्र अवसर भी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पर्व को छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में धार्मिक विश्वास के साथ-साथ सामुदायिक एकता और लोक जीवन की सहज सुंदरता भी दिखाई देती है।

माता भवानी की आराधना से होती है पर्व की शुरुआत

आठों पर्व का संबंध दुर्गा अष्टमी से है। मान्यता के अनुसार इस पावन अवसर पर मां दुर्गा और माता भवानी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शक्ति की उपासना के इस पर्व में श्रद्धालु देवी से परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और कल्याण की कामना करते हैं। घरों में पारंपरिक विधि-विधान से पूजा की जाती है और अपनी लोक परंपराओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

गिरिपार के कई गांवों में इस अवसर पर दराड़ी नामक विशेष जंगली फूल का धार्मिक महत्व है। हिमालयी जंगलों में पाए जाने वाले इन सफेद फूलों को श्रद्धा के साथ एकत्र किया जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार परिवार का एक सदस्य सुबह बिना किसी से बातचीत किए तथा बिना कुछ खाए-पिए इन फूलों को लाता है। इसके बाद दराड़ी के फूलों से माता भवानी अथवा गौरा का पूजन किया जाता है।

यह परंपरा प्रकृति और देवी उपासना के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है। स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यता में दराड़ी के फूल केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं, बल्कि पवित्रता, श्रद्धा और देवी के प्रति समर्पण के प्रतीक हैं।

हुशू मशालें जलाकर बुरी शक्तियों से रक्षा की कामना

आठों पर्व की सबसे आकर्षक और विशिष्ट परंपराओं में हुशू कहलाने वाली पारंपरिक मशालें जलाना शामिल है। गांवों में इन मशालों को जलाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। स्थानीय मान्यता है कि मशालों की अग्नि नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है और घर-परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।

सनातन परंपरा में अग्नि को पवित्रता, प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। दीपक की लौ अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देती है। इसी भाव के अनुरूप गिरिपार में हुशू मशालें जलाने की परंपरा को भी आस्था और शुभकामना से जोड़कर देखा जाता है।

इन मशालों की रोशनी के साथ पर्व का वातावरण भक्तिमय हो उठता है। यह परंपरा लोगों को अपनी जड़ों, अपने देवी-देवताओं और पूर्वजों की विरासत से जोड़ती है। हालांकि बुरी शक्तियों के दूर होने की मान्यता धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा है, जिसका महत्व स्थानीय संस्कृति और श्रद्धा में निहित है।

छोटी दिवाली से बूढ़ी दिवाली तक उत्सव की अनूठी परंपरा

गिरिपार क्षेत्र में दीपावली मनाने का अंदाज भी अपनी अलग पहचान रखता है। यहां त्योहार केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पारंपरिक तिथियों और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार कई दिनों तक उत्सव का माहौल बना रहता है। चौदस, अबांस, पड़ोई, दूज, तीज, चौथ और पंचमी जैसी परंपरागत तिथियों का विशेष महत्व है।

दीपावली से लगभग तीन सप्ताह पहले दुर्गा अष्टमी पर मनाए जाने वाले आठों पर्व को छोटी दिवाली कहा जाता है। इसके अतिरिक्त दीपावली के लगभग एक माह बाद आने वाली अमावस्या के अवसर पर गिरिपार के अनेक गांवों में बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा भी प्रचलित है।

इन पर्वों के माध्यम से क्षेत्र के लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं। लोकगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज, सामूहिक सहभागिता और देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा इन आयोजनों की सांस्कृतिक पहचान हैं।

आस्था, प्रकृति और पूर्वजों की विरासत का संगम

गिरिपार की धार्मिक संस्कृति की विशेषता यह है कि यहां पूजा-पद्धतियों में प्रकृति का विशेष स्थान दिखाई देता है। जंगलों से लाए जाने वाले पवित्र फूल हों या अग्नि की लौ से जुड़ी मशाल परंपरा, इन सभी में प्रकृति के प्रति सम्मान और धार्मिक आस्था का भाव समाहित है।

आज जब आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से अनेक पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं, ऐसे समय में आठों पर्व जैसी परंपराएं सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बुजुर्गों से युवा पीढ़ी तक पहुंचने वाली ये मान्यताएं केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास, सामाजिक एकता और सामूहिक स्मृतियों की धरोहर भी हैं।

गिरिपार में जलती हुशू मशालें इसी जीवंत विरासत का प्रतीक हैं। इनकी रोशनी में माता भवानी के प्रति श्रद्धा, पूर्वजों की परंपराओं के प्रति सम्मान और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का संदेश दिखाई देता है।

आठों पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि लोक संस्कृति किसी क्षेत्र की केवल पहचान नहीं, बल्कि उसकी आत्मा होती है। माता की आराधना, दराड़ी के पवित्र फूलों का पूजन और हुशू मशालों की परंपरा के साथ गिरिपार के लोग अपनी सदियों पुरानी धार्मिक विरासत को आज भी श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ा रहे हैं।

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