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नवरात्रों का वास्तविक संदेश अपने भीतर सद्गुणों का विकास करना :- साध्वी कुलदेवी भारती

RamParkash Vats
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नूरपुर। नवरात्रों के पावन अवसर पर दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के बौड़ नूरपुर आश्रम में आध्यात्मिक प्रवचनों, भजन संकीर्तन का आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया गया। अष्टमी एवं नवमी के पावन दिनों की आध्यात्मिक महत्ता को समर्पित इस कार्यक्रम में उपस्थित भक्तजनों ने महामाई की महिमा का गुणगान किया तथा विश्व कल्याण की मंगल भावना के साथ ध्यान-साधना की।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रभु के श्रीचरणों में मंगल वंदना के साथ हुआ। इस अवसर पर दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री कुलदेवी भारती जी ने आध्यात्मिक प्रवचनों के माध्यम से आत्मशक्ति जागरण एवं ब्रह्मज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक दिव्य शक्ति विद्यमान है, लेकिन अज्ञानता के कारण वह अपनी वास्तविक सामर्थ्य से अनभिज्ञ रहता है। पूर्ण गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की दीक्षा के समय इसी आंतरिक दिव्य शक्ति के अनुभव का मार्ग प्रशस्त होता है। जब जीवात्मा अपने भीतर विद्यमान आध्यात्मिक सत्य को जानती है, तभी उसके जीवन में वास्तविक आत्मजागरण का आरंभ होता है।

साध्वी जी ने समझाया कि मनुष्य बाहरी संसार में सुख, शांति और संतुष्टि की खोज करता रहता है, जबकि स्थायी शांति का आधार उसके भीतर ही विद्यमान है। ब्रह्मज्ञान मनुष्य को स्वयं के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है और उसे अज्ञानता, मोह तथा मन के विकारों से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि नवरात्रों में मां दुर्गा की आराधना केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का संकल्प भी बननी चाहिए।

महामाई की महिमा का वर्णन करते हुए साध्वी जी ने माता वैष्णो देवी की पावन गाथा तथा विभिन्न पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख किया। उन्होंने रक्तबीज के वध की कथा सुनाते हुए बताया कि किस प्रकार आदिशक्ति ने अधर्म और आसुरी प्रवृत्तियों का अंत करके धर्म की स्थापना का संदेश दिया। रक्तबीज का प्रसंग मनुष्य के भीतर बार-बार जन्म लेने वाले विकारों का प्रतीक भी माना जा सकता है। जिस प्रकार नकारात्मक प्रवृत्तियां बार-बार सिर उठाती हैं, उसी प्रकार उन्हें समाप्त करने के लिए आध्यात्मिक जागरूकता और आत्मबल आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि नवरात्रों का वास्तविक संदेश अपने भीतर सद्गुणों का विकास करना, अहंकार का त्याग करना तथा सत्य, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलना है।कार्यक्रम में गुरुभाई आकाश जी ने सुमधुर भजनों का गायन कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। अंत में सभी भक्तजनों ने विश्व कल्याण की भावना से ध्यान-साधना की। कार्यक्रम के पश्चात सामूहिक भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित संगत ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।

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