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हिमाचल में शहरी निकाय चुनाव पर सियासी संग्राम,अर्जुन ठाकुर ने कांग्रेस को घेरा,ज्वाली-नगरोटा-कोटला में चुनाव न होने पर उठे सवाल,जनता के अधिकारों पर छिड़ी बहस

RamParkash Vats
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न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल प्रदेश की सियासत में एक बार फिर शहरी निकाय चुनावों को लेकर बहस तेज हो गई है। जहां एक ओर पूरे प्रदेश में आचार संहिता लागू हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में चुनाव न करवाए जाने का मुद्दा अब राजनीतिक रंग लेता नजर आ रहा है।

संकेतिक चित्र

पूर्व विधायक अर्जुन ठाकुर ने सोशल मीडिया के माध्यम से कांग्रेस सरकार पर सीधा निशाना साधते हुए गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि जब प्रदेश के अधिकांश शहरी निकायों में चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तो फिर कृषि मंत्री चौधरी चंद्र कुमार के विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ज्वाली नगर परिषद, नगरोटा सुरियां नगर पंचायत और कोटला नगर पंचायत में चुनाव क्यों नहीं कराए जा रहे हैं।

यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि पूरी तरह राजनीतिक बन चुका है। विपक्ष इसे सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का अवसर मान रहा है। अर्जुन ठाकुर का कहना है कि इन क्षेत्रों को पहले ही शहरी निकाय घोषित किया जा चुका है, इसके बावजूद चुनाव न होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा आघात है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि चुनाव नहीं करवाने थे, तो इन्हें पंचायत ही रहने दिया जाता।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह मामला स्थानीय स्तर पर जनभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। शहरी निकाय चुनावों में देरी या अनिश्चितता अक्सर सत्ता पक्ष के खिलाफ माहौल बनाने का काम करती है। ऐसे में कांग्रेस सरकार की चुप्पी विपक्ष को और अधिक आक्रामक बना रही है।स

बसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन क्षेत्रों में प्रशासनिक कारणों से चुनाव टाले गए हैं या इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति काम कर रही है। अर्जुन ठाकुर ने यह भी आशंका जताई कि कहीं इन क्षेत्रों का कामकाज अस्थायी रूप से रिटायर्ड अधिकारियों के भरोसे तो नहीं चलाया जा रहा, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है।

लोकतंत्र में जनता का अधिकार सर्वोपरि होता है, और जब लोगों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं मिलता, तो असंतोष स्वाभाविक है। अब देखना होगा कि कांग्रेस सरकार इस मुद्दे पर क्या स्पष्टीकरण देती है और कब तक इन क्षेत्रों में चुनाव करवाए जाते हैं। फिलहाल, यह मामला प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा करता दिख रहा है, जो आने वाले समय में और अधिक गरमा सकता है।

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