बाबा शिब्बो ने श्रद्धा से जाहरवीर गोगा से प्रश्न किया — “हे वीर, क्या मनुष्य को पूर्व जन्म के कर्मों का फल अगले जन्म में मिलता है? यदि मिलता है तो उसका प्रमाण क्या है?”
जाहरवीर गोगा मुस्कुराए और बोले — “हे शिब्बो, यह संसार कर्म का मैदान है। जो बीज बोया जाता है, वही वृक्ष बनकर फल देता है। जैसे किसान आज बीज बोता है और कुछ समय बाद उसी का फल काटता है, वैसे ही आत्मा जन्म-जन्मांतर में अपने कर्मों का फल भोगती है।”
संस्कृत श्लोक
यथा बीजं तथा वृक्षो यथा कर्म तथा फलम्।
पूर्वजन्मकृतं कर्म देहे देहे प्रजायते॥
दोहा
जैसा बोया कर्म का, वैसा मिलता फल।
पूर्व जन्म के संस्कार से, बनता जीवन पल॥
भावार्थ
जाहरवीर गोगा ने समझाया कि संसार में जो भिन्नता दिखाई देती है, वह संयोग नहीं है। कोई जन्म से ही सुख में, कोई दुख में — यह सब पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम है। आत्मा शरीर बदलती है, पर कर्म उसके साथ चलते हैं।
वे आगे बोले — “देखो, कोई बालक जन्म लेते ही सुख-सुविधा में होता है, और कोई जन्म से ही कष्टों में। कोई बिना सीखे ही संगीत में निपुण होता है, कोई ज्ञान में तेज होता है। यह केवल इस जन्म की कमाई नहीं, बल्कि पूर्व जन्म के संस्कारों का परिणाम है। यही कर्म का प्रमाण है।”
न हि कर्मक्षयो लोके कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
दोहा
कर्म कभी मिटते नहीं, शास्त्रों का यह ज्ञान।
भोगे बिना न छूटते, चाहे बीते प्राण॥
भावार्थ
शास्त्र बताते हैं कि कर्म नष्ट नहीं होते। अच्छे कर्म सुख बनकर आते हैं और बुरे कर्म दुख बनकर। इसलिए जीवन की परिस्थितियाँ पूर्व कर्मों का परिणाम मानी जाती हैं।
जाहरवीर गोगा ने आगे दृष्टांत देते हुए कहा — “एक राजा था जिसने अपने जीवन में दान और सेवा की। अगले जन्म में वह गरीब घर में जन्मा, परंतु जहाँ भी गया, लोग उसकी सहायता करते गए, उसके मार्ग स्वयं बनते गए। यह उसके पूर्व जन्म के पुण्य का फल था। वहीं एक धनी व्यक्ति जिसने दूसरों को दुख दिया, अगले जन्म में कष्टों से घिरा रहा। यह उसके कर्मों का परिणाम था।”
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।
सुखं दुःखं भवेद् लोके कर्मणां फलसंचयात्॥
दोहा
दान करे जो पूर्व में, पाए सुख अपार।
दुख दे जो जगत को, दुख उसका संसार॥
भावार्थ
जाहरवीर गोगा ने समझाया कि कर्म ही जन्म-जन्मांतर का कारण बनते हैं। जो पुण्य करता है, उसे सहारा मिलता है और जो पाप करता है, उसे कष्ट मिलता है। यही कर्म सिद्धांत है।
फिर उन्होंने कहा — “कर्म तीन प्रकार के होते हैं — संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म। संचित कर्म कई जन्मों से जमा होते हैं, प्रारब्ध कर्म वर्तमान जीवन में फल देते हैं और क्रियमाण कर्म भविष्य का निर्माण करते हैं। मनुष्य अपने वर्तमान कर्मों से भविष्य बदल सकता है, इसलिए केवल भाग्य को दोष न दो, बल्कि कर्म को सुधारो।”
संचितं कर्म भुञ्जानो प्रारब्धं फलमश्नुते।
क्रियमाणं भवेत् पश्चात् जन्मान्तरफलप्रदम्॥
दोहा
संचित कर्म भंडार है, प्रारब्ध मिला प्रसंग।
क्रियमाण से बन रहा, आगे जीवन रंग॥
भावार्थ
जाहरवीर गोगा ने बताया कि मनुष्य का वर्तमान जीवन प्रारब्ध का परिणाम है, परंतु वह अपने कर्मों से भविष्य बदल सकता है। इसलिए कर्म ही मनुष्य का सच्चा धन है।
यह सुनकर बाबा शिब्बो ने सिर झुकाया और कहा —
“अब समझ गया प्रभु, कर्म ही मनुष्य का सच्चा धन है।”

