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धारावाहिक (52) भारत के स्वतंत्र सैनानी देशबंधु चित्तरंजन दास: त्याग, संघर्ष और स्वराज का अमर स्वर

RamParkash Vats
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कोलकाता, 5 नवंबर 1870—भारत की स्वतंत्रता गाथा में एक ऐसा नाम, जो त्याग, तप और तेज का पर्याय बन गया—देशबंधु चित्तरंजन दास एक समृद्ध परिवार में जन्मे, उच्च शिक्षा प्राप्त कर इंग्लैंड से वकालत की डिग्री लेकर लौटे, पर अंततः सब कुछ राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दिया।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रख्यात अधिवक्ता के रूप में उन्होंने शीघ्र ही ख्याति अर्जित की। 1908 के ऐतिहासिक Alipore Bomb Case में Aurobindo Ghosh का सफल बचाव कर उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। किंतु यह सफलता उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं थी—उनकी दृष्टि तो देश की आज़ादी पर केंद्रित थी।
1920 में जब Mahatma Gandhi ने Non-Cooperation Movement का आह्वान किया, तब देशबंधु ने अपनी चमकदार वकालत को त्यागकर स्वतंत्रता संग्राम की राह चुन ली। उनका यह निर्णय त्याग और देशभक्ति का अनुपम उदाहरण बन गया।
राजनीतिक क्षेत्र में भी उनका योगदान अद्वितीय रहा। 1922 में गया अधिवेशन में Indian National Congress की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने स्वराज की दिशा में नई ऊर्जा का संचार किया। 1923 में Motilal Nehru के साथ मिलकर Swaraj Party की स्थापना की, जिसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध वैधानिक संघर्ष को नई धार दी।
1924 में वे Calcutta Municipal Corporation के प्रथम निर्वाचित मेयर बने और नगर प्रशासन में स्वदेशी नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत किया। हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक देशबंधु ने 1923 के Bengal Pact के माध्यम से सामाजिक सौहार्द का संदेश दिया।
देशबंधु केवल एक नेता ही नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक भी थे। Subhas Chandra Bose जैसे तेजस्वी व्यक्तित्व ने उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना। उनके नेतृत्व में बोस के भीतर राष्ट्रसेवा की ज्योति और प्रखर हुई।
16 जून 1925 को Darjeeling में उनका निधन हो गया। उनके प्रस्थान पर समूचा राष्ट्र शोकाकुल हो उठा। Mahatma Gandhi ने स्वयं उनकी अंतिम यात्रा का नेतृत्व कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
देशबंधु चित्तरंजन दास का जीवन संदेश देता है—
“जो राष्ट्र के लिए जिए, वही सच्चा जीवन है;
जो राष्ट्र पर निछावर हो जाए, वही अमर हो जाता है।”
आज भी उनका त्याग, उनका संघर्ष और उनका स्वप्न—स्वराज—भारत की आत्मा में गूंजता है।

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