Editorial viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats
भाग एक :- कुल्लू-मंडी की पावन धरती: मात्र एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि देव-आदेशों को सर्वोपरि मानने वाली जीवंत परंपरा और अटूट लोक-आस्था का सबसे बड़ा जीवंत केंद्र।
कुल्लू और मंडी की घाटियाँ केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि यहाँ की जीवन-शैली, आस्था और सामाजिक व्यवस्था की धुरी देव संस्कृति है। इस अंचल का जनमानस देवी-देवताओं के आदेश को सर्वोपरि मानता आया है। यहाँ देवता केवल पूजनीय नहीं, बल्कि समाज के मार्गदर्शक, न्यायकर्ता और प्रकृति के संरक्षक हैं। यही कारण है कि प्रकृति के आंचल में निवास करने वाले इन देवी-देवताओं के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ को यहाँ स्वीकार नहीं किया जाता।
बर्ष 2025 में सामने आई त्रासदी ने इस कटु सत्य को एक बार फिर उजागर कर दिया। विकास की अंधी दौड़ में जब देव स्थलों, वनों, जलस्रोतों और प्राकृतिक ढांचे से खिलवाड़ किया गया, तो उसका परिणाम भयावह आपदा के रूप में सामने आया। यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि आस्था और परंपरा की अनदेखी का दुष्परिणाम भी थी।
देव संसद की चेतावनी: आस्था का सामूहिक स्वर
इसी पृष्ठभूमि में कुल्लू की पुरातन राजधानी नग्गर के जगती पट्ट में आयोजित देव संसद ने समाज और सत्ता—दोनों को आईना दिखाने का कार्य किया था। शुक्रवार, 31 अक्टूबर को आयोजित इस देव संसद में 260 से अधिक देवी-देवताओं की उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बना दिया था। देव संस्कृति के इतिहास में यह पहला अवसर था जब मंडी जिले की स्नोर घाटी और लाहुल घाटी के देवताओं ने भी जगती में शिरकत की थी।
देव संसद में देवी-देवताओं ने एक स्वर में चेताया कि धार्मिक स्थलों को धार्मिक ही रहने दिया जाए, उन्हें पर्यटन या व्यवसाय का केंद्र न बनाया जाए। देवताओं का स्पष्ट संदेश था कि यदि आस्था के स्थानों से छेड़छाड़ जारी रही, तो भविष्य में इससे भी अधिक गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। हाल के वर्ष 2025 में लगातार बढ़ रही आपदाओं को इसी अनदेखी का परिणाम बताया गया।
देव स्थलों से छेड़छाड़ और बढ़ता असंतोष
देव संसद में यह भी खुलासा हुआ कि देव स्थलों में हो रहे निर्माण, व्यावसायीकरण और परंपराओं के उल्लंघन से देवी-देवता विशेष रूप से नाराज हैं। सड़कों पर गौ माता के तिरस्कार को भी देव असंतोष का बड़ा कारण बताया गया। देवताओं के अनुसार, जब मानव अपनी सीमाएँ लांघकर स्वयं को सर्वोपरि समझने लगता है, तब संतुलन टूटता है और प्रलय जैसे हालात बनते हैं।
देव नीति से राजनीति दूर रखने की मांग
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने देव संसद के निष्कर्ष साझा करते हुए कहा कि देवताओं ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि देव नीति में राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज इंसान स्वयं को देवी-देवताओं से बड़ा समझने लगा है और हर स्तर पर देव नियमों का उल्लंघन हो रहा है—जो कि समूची मानवता के लिए खतरे की घंटी है।
सारगर्भित है कि कुल्लू–मंडी की देव संस्कृति कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और आस्था के बीच संतुलन का जीवंत दर्शन है। बर्ष 2025 की त्रासदी और देव संसद की चेतावनी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यदि विकास प्रकृति और परंपरा के विरुद्ध होगा, तो उसका मूल्य विनाश के रूप में चुकाना पड़ेगा। अब समय है कि नीति-निर्माता, प्रशासन और समाज—तीनों मिलकर देव संस्कृति के मूल भाव को समझें और सम्मान दें, वरना आने वाला समय और भी भयावह हो सकता है।

