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13 किलोमीटर में हांफ गई निगम की बस, कब सुधरेगा एचआरटीसी का खस्ताहाल बेड़ा?

RamParkash Vats
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नूरपुर से Writer विनय महाजन चिंतन-मंथन

सरकारी परिवहन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठते सवाल, यात्रियों की सुरक्षा और चालकों की जिम्मेदारी पर गंभीर मंथन जरूरी

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हिमाचल प्रदेश की सड़कों पर दौड़ने वाली हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की बसें प्रदेश के लाखों लोगों के लिए केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का महत्वपूर्ण सहारा हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक, विद्यार्थियों, कर्मचारियों, बुजुर्गों और मरीजों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने में निगम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन जब यही सरकारी परिवहन व्यवस्था यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ने लगे, तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ताजा मामला पठानकोट डिपो की एक बस का है, जो पठानकोट से चलकर महज 13 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद हिमाचल प्रदेश के कंडवाल के समीप खराब होकर खड़ी हो गई। बताया जा रहा है कि बस लंबे रूट पर जा रही थी और उसमें ऐसे यात्री सवार थे, जिन्होंने अपने जरूरी काम समय पर निपटाने के लिए निगम की बस पर भरोसा किया था। बस के अचानक खराब होने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। डिपो प्रबंधक विजय चौधरी के अनुसार बस की क्लच प्लेट में तकनीकी खराबी आने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई। सवाल यह है कि आखिर लंबी दूरी के रूट पर भेजने से पहले बस की तकनीकी जांच कितनी गंभीरता से की जाती है? यदि बस की क्लच प्लेट में खराबी थी, तो क्या उसे कार्यशाला से बाहर निकालने से पहले इसकी पहचान नहीं होनी चाहिए थी? महज 13 किलोमीटर के सफर में बस का हांफ जाना निगम की तकनीकी व्यवस्था और रखरखाव की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

यह घटना किसी एक बस की खराबी तक सीमित मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकती। प्रदेश में एचआरटीसी के बस बेड़े की स्थिति को लेकर समय-समय पर यात्रियों और क्षेत्रवासियों की ओर से शिकायतें सामने आती रही हैं। कई बसें ऐसी दिखाई देती हैं, जिनकी बाहरी स्थिति से ही उनके रखरखाव की आवश्यकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि किसी बस की वास्तविक तकनीकी स्थिति का निर्धारण विशेषज्ञों की जांच से ही संभव है, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी शिकायतों को हल्के में लेना उचित नहीं होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या निगम की प्रत्येक बस को रूट पर भेजने से पहले निर्धारित मानकों के अनुसार तकनीकी परीक्षण से गुजरना पड़ता है? क्या ब्रेक, क्लच, टायर, स्टीयरिंग और इंजन की स्थिति की नियमित जांच सुनिश्चित की जाती है? यदि बसें कार्यशाला से निकलने के कुछ ही समय बाद रास्ते में खराब हो रही हैं, तो यह केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि रखरखाव की व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता का संकेत भी हो सकता है। दिन के समय बस खराब होने पर यात्री किसी तरह दूसरी बस या अन्य साधन का सहारा ले सकते हैं, लेकिन यदि यही घटना रात के समय किसी सुनसान पहाड़ी सड़क पर हो जाए, तो यात्रियों की परेशानी और सुरक्षा संबंधी जोखिम कई गुना बढ़ सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम, अंधेरे और दुर्गम रास्तों के बीच खराब बस यात्रियों के लिए गंभीर संकट बन सकती है। ऐसे में निगम की जिम्मेदारी केवल बस चलाने तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षित और भरोसेमंद परिवहन उपलब्ध कराने की भी है।

एचआरटीसी के चालक भी इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्हें प्रतिदिन यात्रियों की जान की जिम्मेदारी के साथ पहाड़ी और चुनौतीपूर्ण सड़कों पर बसें चलानी पड़ती हैं। यदि बस की तकनीकी स्थिति संतोषजनक नहीं है, तो चालक के सामने भी जोखिमपूर्ण परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि निगम चालक दल की शिकायतों को गंभीरता से सुने और बसों की खराबी के संबंध में उनकी ओर से दी जाने वाली जानकारी पर तत्काल कार्रवाई करे। किसी भी चालक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह खराब तकनीकी स्थिति वाली बस को जोखिम उठाकर चलाए। इसके लिए निगम को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें चालक को तकनीकी खराबी की आशंका होने पर बस को रूट पर ले जाने से रोकने का अधिकार और आवश्यक सहयोग मिले। प्रदेश सरकार तथा परिवहन निगम के उच्च अधिकारियों को चाहिए कि वे बसों के रखरखाव, कार्यशालाओं की कार्यप्रणाली और तकनीकी निरीक्षण व्यवस्था की समीक्षा करें। जिन बसों की आयु पूरी हो चुकी है अथवा जो निर्धारित सुरक्षा मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें चरणबद्ध तरीके से बेड़े से हटाने की नीति बनाई जाए। साथ ही नई बसों की खरीद, पुराने वाहनों के प्रतिस्थापन और दूरदराज के क्षेत्रों में बेहतर परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। यह भी जरूरी है कि बसों की तकनीकी खराबी के मामलों का रिकॉर्ड रखा जाए, ताकि बार-बार खराब होने वाले वाहनों की पहचान कर समय रहते उचित कार्रवाई की जा सके।

लोकतंत्र में जनहित सर्वोपरि होता है और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सीधे आम नागरिकों के जीवन से जुड़ी है। एचआरटीसी की बसें केवल सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का प्रतीक हैं। जब कोई यात्री टिकट खरीदकर बस में बैठता है, तो वह केवल किराया नहीं देता, बल्कि निगम पर अपनी सुरक्षा और समय की जिम्मेदारी भी सौंपता है। यदि यह भरोसा बार-बार टूटता है, तो सरकारी परिवहन व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर होना स्वाभाविक है। पठानकोट से कंडवाल तक महज 13 किलोमीटर में बस का खराब होना निगम के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए। इसे एक सामान्य तकनीकी खराबी बताकर औपचारिकता पूरी करने के बजाय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। प्रदेश सरकार को परिवहन निगम के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ जवाबदेही की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी। डिपो स्तर पर बसों की फिटनेस, मरम्मत और रूट पर भेजने की प्रक्रिया की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। यात्रियों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि वे जिस बस में सफर कर रहे हैं, वह तकनीकी रूप से सुरक्षित है और उन्हें रास्ते में असहाय नहीं छोड़ देगी। आखिर सवाल केवल एक बस के 13 किलोमीटर में हांफने का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जिसके सहारे हिमाचल का आम नागरिक सरकारी बस में बैठकर अपने गंतव्य की ओर निकलता है। अब समय आ गया है कि निगम की बसों की हालत सुधारने के लिए कागजी दावों से आगे बढ़कर धरातल पर ठोस कार्रवाई की जाए, ताकि यात्रियों की सुरक्षा और सार्वजनिक परिवहन की विश्वसनीयता दोनों सुनिश्चित हो सकें।

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