जान जोखिम में डालकर जनता की आवाज उठाते हैं पत्रकार, फिर भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होने का आरोप; हमलों, धमकियों और झूठे मुकदमों की शिकायतों पर कपिल शर्मा ने उठाए सवाल
पत्रकार सुरक्षा कानून, आर्थिक अधिकारों और छोटे समाचार पत्रों के संरक्षण की मांग; देशभर के पत्रकारों से एकजुट होकर अपने हक की आवाज बुलंद करने की अपील
सिरमौर: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पहचाने जाने वाले पत्रकार समाज की समस्याओं, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सरकारी योजनाओं में अनियमितताओं और आम जनता के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को अपनी जान जोखिम में डालकर सामने लाते हैं। कई बार पत्रकारों को सच्चाई उजागर करने की कीमत धमकियों, हमलों, दबाव और कानूनी परेशानियों के रूप में चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद पत्रकारों की सुरक्षा के लिए पुख्ता व्यवस्था और उनके अधिकारों के संरक्षण को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि दूसरों को न्याय दिलाने की आवाज उठाने वाले पत्रकारों को अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए कब न्याय मिलेगा?
सिरमौर के कपिल शर्मा ने पत्रकारों की सुरक्षा और अधिकारों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पत्रकारिता केवल समाचार प्रकाशित करने या प्रसारित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज और शासन के बीच संवाद स्थापित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। पत्रकार दिन-रात मेहनत करके जनता की समस्याओं को प्रशासन और सरकार तक पहुंचाते हैं। कई बार विपरीत परिस्थितियों में घटनास्थल पर पहुंचकर समाचार संकलित करते हैं और जनहित से जुड़े सवाल उठाते हैं। लेकिन जब किसी खबर से प्रभावशाली व्यक्तियों के हित प्रभावित होते हैं, तो पत्रकारों पर दबाव बनाने, धमकाने और कानूनी कार्रवाई के जरिए परेशान करने की शिकायतें सामने आती हैं।
कपिल शर्मा ने कहा कि पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना है। यदि किसी पत्रकार पर हमला होता है या उसे उसकी रिपोर्टिंग के कारण प्रताड़ित किए जाने की शिकायत सामने आती है, तो मामले की निष्पक्ष जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कानून सभी के लिए समान है और पत्रकार भी कानून से ऊपर नहीं हैं, लेकिन किसी पत्रकार को केवल जनहित में सवाल उठाने या समाचार प्रकाशित करने के कारण दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़े। आरोपों और शिकायतों की जांच तथ्यों तथा कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए।
उन्होंने पत्रकारों के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था बनाने, हमलों के मामलों में त्वरित कार्रवाई करने और पत्रकारिता की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की। उनका कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा केवल किसी एक पत्रकार या मीडिया संस्थान का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है। जब पत्रकार भयमुक्त होकर काम कर सकेंगे, तभी जनता की समस्याओं को मजबूती से उठाया जा सकेगा।
आर्थिक सुरक्षा और छोटे समाचार पत्रों के संरक्षण का मुद्दा
कपिल शर्मा ने पत्रकारों की आर्थिक स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विशेषकर छोटे और स्वतंत्र समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकारों को सीमित संसाधनों में काम करना पड़ता है। समाचार संकलन, परिवहन, तकनीकी संसाधनों और प्रकाशन पर होने वाले खर्च के बावजूद अनेक पत्रकारों को पर्याप्त आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाता। ऐसे में पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा, उचित मानदेय और छोटे समाचार पत्रों के हितों की रक्षा के लिए ठोस नीतियां बनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने सरकारी विज्ञापनों के वितरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग करते हुए कहा कि विज्ञापन नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे पात्र समाचार पत्रों को निर्धारित नियमों के अनुसार अवसर मिल सके। पत्रकारों के कल्याण, सुरक्षा और आर्थिक अधिकारों को लेकर सरकार, मीडिया संस्थानों तथा पत्रकार संगठनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
अपने अधिकारों के लिए एकजुट हों पत्रकार
कपिल शर्मा ने देशभर के पत्रकारों से सवाल किया कि जब समाज के विभिन्न वर्ग अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठा सकते हैं, तो पत्रकार अपने हक की लड़ाई के लिए एक मंच पर क्यों नहीं आते? उन्होंने कहा कि पत्रकार दूसरों की समस्याओं को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं, लेकिन जब बात उनकी अपनी सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक अधिकारों की आती है, तो अक्सर उनकी आवाज बिखरी हुई दिखाई देती है।
उन्होंने पत्रकार संगठनों, प्रेस क्लबों और मीडिया संस्थानों से राजनीतिक तथा व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर साझा मंच तैयार करने की अपील की। साथ ही पत्रकार सुरक्षा कानून, झूठे मुकदमों से संरक्षण, आर्थिक अधिकारों और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से देशव्यापी अभियान चलाने पर जोर दिया।
कपिल शर्मा के अनुसार, पत्रकारों की एकजुटता किसी व्यक्ति या संस्था के विरोध में नहीं, बल्कि सुरक्षित और स्वतंत्र पत्रकारिता के पक्ष में होनी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारों के अधिकारों पर केवल चर्चाएं न हों, बल्कि उनकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएं। आखिरकार, जब पत्रकार ही सुरक्षित नहीं होंगे, तो जनता की आवाज निर्भीकता से कौन उठाएगा?

