न्यूज इंडिया आजतक, संपादकीय डेक्स, संपादक राम प्रकाश बत्स
हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक चुनौतियों के बीच यदि कोई तंत्र सबसे अधिक जीवनरेखा का कार्य करता है, तो वह है परिवहन। ऐसे में कांगड़ा वैली रेलवे के गेज परिवर्तन हेतु DPR सर्वे का आरंभ केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि विकास की दिशा में एक दूरगामी संकेत है।
पठानकोट से जोगिंदरनगर तक फैली यह ऐतिहासिक रेल लाइन वर्षों से नैरो गेज पर संचालित होती रही है। अपनी सीमित गति और क्षमता के बावजूद यह क्षेत्र के लोगों के लिए भरोसेमंद साधन रही है। किंतु बदलते समय और बढ़ती आवश्यकताओं के बीच अब इसका ब्रॉड गेज में रूपांतरण अनिवार्य प्रतीत होता है।
संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह पहल हिमाचल के लिए अवसर और चुनौती—दोनों का संगम है। एक ओर ब्रॉड गेज से बेहतर कनेक्टिविटी, तीव्र गति, और पर्यटन को नई उड़ान मिलने की संभावना है; वहीं दूसरी ओर पहाड़ी भूगोल, पर्यावरणीय संतुलन और विरासत संरक्षण जैसे प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
यह रेलमार्ग केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि कांगड़ा घाटी की सांस्कृतिक पहचान भी है। इसकी सुरंगें, पुल और प्राकृतिक दृश्यों के बीच गुजरती पटरियाँ इसे विशिष्ट बनाती हैं। ऐसे में गेज परिवर्तन के दौरान इसकी ऐतिहासिक आत्मा को अक्षुण्ण रखना नीति-निर्माताओं की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।
DPR सर्वे इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार तैयार करेगा। यह स्पष्ट करेगा कि परियोजना आर्थिक रूप से कितनी व्यवहार्य है, पर्यावरण पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा और स्थानीय समुदायों को इससे कितना लाभ होगा। अतः आवश्यक है कि यह सर्वे केवल आंकड़ों तक सीमित न रहकर जनभावनाओं और पर्यावरणीय संतुलन को भी समान महत्व दे।
अंततः, यदि यह परियोजना संतुलित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ती है, तो यह हिमाचल प्रदेश के लिए विकास की नई पटरी बिछा सकती है। परंतु विकास की इस दौड़ में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विरासत और प्रकृति की अनदेखी न हो—क्योंकि यही हिमाचल की असली पहचान है।(सौजन्य रेलवे विभाग)

